Popular:
ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 50 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 50 • ऋचा / मन्त्र 2

10.50.2

Mantra ID: 10.50.2

सो चि॒न्नु सख्या॒ नर्य॑ इ॒नः स्तु॒तश्च॒र्कृत्य॒ इन्द्रो॒ माव॑ते॒ नरे॑ । विश्वा॑सु धू॒र्षु वा॑ज॒कृत्ये॑षु सत्पते वृ॒त्रे वा॒प्स्व१॒॑भि शू॑र मन्दसे ॥ (२)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 10.50.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मित्रता के कारण मनुष्यों के हितैषी, सबके ईश्वर, सबके द्वारा प्रशंसित इंद्र मुझ जैसे व्यक्ति द्वारा बार-बार सेवनीय हैं. हे सज्जनों के पालक एवं शूर इंद्र! सभी कठिन कार्यो एवं शक्ति द्वारा संपन्न होने वाले करमो में तथा जलप्राप्ति के लिए सब तुम्हारी पूजा करते हैं. (२)

EN English Translation

Because of friendship, the benefactor of man, the God of all, the admired Indra by all, is repeatedly consumed by a person like me. O the guardian and knight of the gentlemen Indra! In all the hard work and power that is accomplished and for the sake of water, everyone worships you. (2)

卐 HinduText AI