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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 52 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 52 • ऋचा / मन्त्र 5

10.52.5

Mantra ID: 10.52.5

आ वो॑ यक्ष्यमृत॒त्वं सु॒वीरं॒ यथा॑ वो देवा॒ वरि॑वः॒ करा॑णि । आ बा॒ह्वोर्वज्र॒मिन्द्र॑स्य धेया॒मथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयाति ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.52.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे देवो! मैं तुम्हारी हव्य-वहनरूपी सेवा करता हूं, इसलिए तुमसे मरणरहित होने एवं संतानयुक्त होने की याचना करता हूं. मैं इंद्र की दोनों भुजाओं में वज्र देता हूं, जिससे वे सभी शत्रु सेनाओं को जीतते हैं.” (५)

EN English Translation

Oh, God! I serve you in a human-to-carry manner, so I beseech you to be without death and have children. I give thunder in both arms of Indra, so that they conquer all enemy armies." (5)

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