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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 55 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 55 • ऋचा / मन्त्र 2

10.55.2

Mantra ID: 10.55.2

म॒हत्तन्नाम॒ गुह्यं॑ पुरु॒स्पृग्येन॑ भू॒तं ज॒नयो॒ येन॒ भव्य॑म् । प्र॒त्नं जा॒तं ज्योति॒र्यद॑स्य प्रि॒यं प्रि॒याः सम॑विशन्त॒ पञ्च॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.55.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम्हारा अन्यों के द्वारा अज्ञात एवं बहुतों द्वारा अभिलषित आकाशरूपी शरीर अत्यंत विस्तृत है. उसी से तुमने भूत और भविष्यत्‌ को उत्पन्न किया है. उसीसे तुम्हारा प्रिय तत्त्व प्राचीन ज्योति अर्थात्‌ आदित्य उत्पन्न हुआ. उसी के कारण पंचजन प्रसन्न हुए. (२)

EN English Translation

O Indra! Your heavenly body, unknown by others and characterized by many, is very wide. From him you have created the past and the future. From him came your beloved element, the ancient light i.e. Aditya. Because of that, the Panchjanwas pleased. (2)

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