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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 65 • Mantra / Rik 14

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 65 • ऋचा / मन्त्र 14

10.65.14

Mantra ID: 10.65.14

विश्वे॑ दे॒वाः स॒ह धी॒भिः पुरं॑ध्या॒ मनो॒र्यज॑त्रा अ॒मृता॑ ऋत॒ज्ञाः । रा॒ति॒षाचो॑ अभि॒षाचः॑ स्व॒र्विदः॒ स्व१॒॑र्गिरो॒ ब्रह्म॑ सू॒क्तं जु॑षेरत ॥ (१४)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.65.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

कर्मो एवं ज्ञानों से युक्त, मानवीय यज्ञों में सत्कार के पात्र, मरणरहित, सत्य को जानने वाले, हव्यग्रहणकर्ता, सामने से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले एवं सब कुछ प्राप्त करने वाले इंद्रादि देव हमारी स्तुतियों एवं अन्न को ग्रहण करें. (१४)

EN English Translation

May Indradi Dev, who is full of deeds and knowledge, the vessels of hospitality in human yagnas, the deathless, the knower of the truth, the recipient, the one who joins the yagna from the front and receives everything, may Indradi Dev receive our praises and food. (14)

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