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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 65 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 65 • ऋचा / मन्त्र 5

10.65.5

Mantra ID: 10.65.5

मि॒त्राय॑ शिक्ष॒ वरु॑णाय दा॒शुषे॒ या स॒म्राजा॒ मन॑सा॒ न प्र॒युच्छ॑तः । ययो॒र्धाम॒ धर्म॑णा॒ रोच॑ते बृ॒हद्ययो॑रु॒भे रोद॑सी॒ नाध॑सी॒ वृतौ॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.65.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्तोताओं को धन देने वाले मित्र और वरुण को हव्य दो. भली प्रकार सुशोभित ये दोनों मन से कभी असावधान नहीं होते. इनका शरीर अपने तेज से प्रकाशित होता है. विस्तृत द्यावा-पृथिवी याचना करती हुई इनके समीप उपस्थित होती है. (५)

EN English Translation

Give hello to the friend who gives money to the psalms and to Varun. Well-groomed, these two are never mindless. Their body is illuminated by its own brightness. The broad earth is present near them, begging. (5)

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