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10.86.5
प्रि॒या त॒ष्टानि॑ मे क॒पिर्व्य॑क्ता॒ व्य॑दूदुषत् । शिरो॒ न्व॑स्य राविषं॒ न सु॒गं दु॒ष्कृते॑ भुवं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (५)
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ऋग्वेद मन्त्र 10.86.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
इंद्राणी ने कहा-“यजमानों द्वारा मेरे लिए निर्मित प्रिय हवि वृषाकपि ने दूषित कर दिए. मैं शीघ्र ही इसका सिर काट डालूंगी. मैं इस दुष्कर्म करने वाले का सुख नहीं चाहती. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (५)
EN English Translation
Indrani said, "The beloved Havi Vrishakapi, made for me by the hosts, was contaminated. I'll cut off his head soon. I don't want the happiness of this vicious. Indra is the best. (5)