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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 21 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 21 • ऋचा / मन्त्र 5

4.21.5

Mantra ID: 4.21.5

उप॒ यो नमो॒ नम॑सि स्तभा॒यन्निय॑र्ति॒ वाचं॑ ज॒नय॒न्यज॑ध्यै । ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः पु॑रु॒वार॑ उ॒क्थैरेन्द्रं॑ कृण्वीत॒ सद॑नेषु॒ होता॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.21.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

समस्त लोकों का स्तंभन करके, यज्ञ के निमित्त गर्जनरूपी ध्वनि करने वाले, हव्य ग्रहण करके वर्षा द्वारा लोगों को अन्न देने वाले एवं उत्तम स्तोत्रं द्वारा स्तुति करने योग्य इंद्र को हम बुलाते हैं. (५)

EN English Translation

We call Indra, who erects all the people, who makes a roaring sound for the sake of the yagna, who gives food to the people by the rain by taking the haavya, and praiseworthy of the people by the best hymns. (5)

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