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4.44.3
को वा॑म॒द्या क॑रते रा॒तह॑व्य ऊ॒तये॑ वा सुत॒पेया॑य वा॒र्कैः । ऋ॒तस्य॑ वा व॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॒ नमो॑ येमा॒नो अ॑श्वि॒ना व॑वर्तत् ॥ (३)
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ऋग्वेद मन्त्र 4.44.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३)
EN English Translation
Which host who gives soma today praises him by praises for his protection, the fulfillment of somerasana or yajna? O Ashwinikumaro! Who greets you draws you to his yajna? (3)