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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 56 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 56 • ऋचा / मन्त्र 1

4.56.1

Mantra ID: 4.56.1

म॒ही द्यावा॑पृथि॒वी इ॒ह ज्येष्ठे॑ रु॒चा भ॑वतां शु॒चय॑द्भिर॒र्कैः । यत्सीं॒ वरि॑ष्ठे बृह॒ती वि॑मि॒न्वन्रु॒वद्धो॒क्षा प॑प्रथा॒नेभि॒रेवैः॑ ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.56.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे महान्‌ एवं विशाल द्यावा-पृथ्वी! इस यज्ञ में दीप्तियुक्त मंत्रों से तेजस्वी बनो, क्योंकि जल बरसाने वाले बादल विस्तृत एवं महान्‌ धरती-आकाश को स्थापित करते हैं तथा गमनशील व प्रसिद्ध मरुतों के साथ सभी जगह गरजते हैं. (१)

EN English Translation

O great and vast earth! Be bright with the radiant mantras in this yajna, because the clouds that rain water establish the vast and great earth-sky and roar all over the place with the moving and famous maruts. (1)

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