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5.60.4
व॒रा इ॒वेद्रै॑व॒तासो॒ हिर॑ण्यैर॒भि स्व॒धाभि॑स्त॒न्वः॑ पिपिश्रे । श्रि॒ये श्रेयां॑सस्त॒वसो॒ रथे॑षु स॒त्रा महां॑सि चक्रिरे त॒नूषु॑ ॥ (४)
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ऋग्वेद मन्त्र 5.60.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
विवाह के योग्य धनी नवयुवक जिस तरह सोने के गहनों एवं जलों में स्नान द्वारा अपने शरीर को सुंदर बनाता है, उसी तरह सर्वश्रेष्ठ व शक्तिशाली मरुद्गण रथों पर एकत्रित होकर अपने शरीरों में महान् शोभा धारण करते हैं. (४)
EN English Translation
Just as the marriageable rich youth makes his body beautiful by bathing in gold ornaments and water, the best and powerful deserts gather on chariots and adorn their bodies greatly. (4)