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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 37 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 37 • ऋचा / मन्त्र 5

8.37.5

Mantra ID: 8.37.5

क्षेम॑स्य च प्र॒युज॑श्च॒ त्वमी॑शिषे शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ । माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.37.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम समस्त रक्षासाधनों के द्वारा सारे संसार एवं योगक्षेम के स्वामी हो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (५)

EN English Translation

O Yajnaswamy Indra! You are the master of the whole world and yogaksham through all the means of defense. O blasphemous, thunderbolt and vrithrahanta Indra! You drink somras in the median savan. (5)

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