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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 57 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 57 • ऋचा / मन्त्र 5

8.57.5

Mantra ID: 8.57.5

अ॒भिष्ट॑ये स॒दावृ॑धं॒ स्व॑र्मीळ्हेषु॒ यं नरः॑ । नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.57.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यजमानो! मैं तुम्हारी सहायता के लिए सदा बढ़ने वाले इंद्र को आने के लिए निवेदन करता हूं. उन्हें मनुष्य युद्धों में अपनी श्रद्धा के निमित्त भांति-भांति से बुलाते हैं. (५)

EN English Translation

O hosts! I request the ever-growing Indra to come to your aid. They are called by men in various ways for their faith in wars. (5)

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