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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 59 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 59 • ऋचा / मन्त्र 5

8.59.5

Mantra ID: 8.59.5

यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः । न त्वा॑ वज्रिन्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.59.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! यदि सौ द्यौ एवं सौ भूमियां हो जावें, तब भी तुम्हें नापा नहीं जा सकता. हे वज्रधारी इंद्र! सौ सूर्य तुम्हें प्रकाशित नहीं कर सकते और न आठ द्यावा-पृथिवी तुम्हारी सीमा बना सकते हैं. (५)

EN English Translation

O Indra! Even if there are a hundred or so many lands, you cannot be measured. O thunderbolt Indra! A hundred suns cannot illuminate you, nor can the eight earths make your limits. (5)

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