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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 63 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 63 • ऋचा / मन्त्र 4

8.63.4

Mantra ID: 8.63.4

आग॑न्म वृत्र॒हन्त॑मं॒ ज्येष्ठ॑म॒ग्निमान॑वम् । यस्य॑ श्रु॒तर्वा॑ बृ॒हन्ना॒र्क्षो अनी॑क॒ एध॑ते ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.63.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं पापों का भली प्रकार नाश करने वाले, प्रशंसनीय एवं मानवहितकारी उन अग्नि की स्तुति करता हूं, जिनकी ज्वालाओं में श्रुतर्वा एवं महान्‌ ऋक्षपुत्र यज्ञकर्म करते हैं. (४)

EN English Translation

I praise the well-repressed, praiseworthy and human-benevolent agni of sins, in whose flames the sons of Shrutrva and the great Riksh perform yajnakarma. (4)

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