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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 110 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 110 • ऋचा / मन्त्र 4

9.110.4

Mantra ID: 9.110.4

अजी॑जनो अमृत॒ मर्त्ये॒ष्वाँ ऋ॒तस्य॒ धर्म॑न्न॒मृत॑स्य॒ चारु॑णः । सदा॑सरो॒ वाज॒मच्छा॒ सनि॑ष्यदत् ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.110.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मरणरहित सोम! तुमने सच्चे एवं कल्याणकारी जल को धारण करने वाले अंतरिक्ष में सूर्य को इसलिए उत्पन्न किया था कि वह मनुष्यों के सामने जा सके. तुम सबकी सेवा करते हुए सदा संग्राम की ओर जाते हो. (४)

EN English Translation

O mortal Mon! You created the sun in space that holds true and good water so that it could go before man. You always go to the struggle while serving everyone. (4)

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