Popular:
सामवेद

Chapter / Prapathak 18 • Dashati / Sukta 5 • Mantra 10

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 18 • दशती / सूक्त 5 • मन्त्र 10

18.5.10

Mantra ID: 18.5.10

स भक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे । तेजिष्ठा अपो मँहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः ॥ (१०)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

सामवेद मन्त्र 18.5.10 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सोमरस अमृत भक्षण करता है. वह स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों को अमृत जैसे जल से भर देता है. जब यजमान देवस्थान को हविमय बनाते हैं तो सोम जल को अपने महत्त्व से तेजोमय बना देते हैं. (१०)

EN English Translation

Someras consumes nectar. He fills both heaven and earth with nectar-like water. When the hosts make the devasthan havimaya, Soma makes the water bright with its importance. (10)

卐 HinduText AI