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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 11

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 11

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.11

Mantra: 1.11 [Kathopanishad_1.11]

यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँरात्रीः शयिता वीतमन्यु- स्त्वा ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 11 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा । और शेष रात्रियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्युके मुखसे छूटकर आया हुआ देखेगा ॥ ११ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सन्नौद्दालकिः उद्दालक एवौद्दालकिः। अरुणस्यापत्यमारुणिः, द्व्यामुष्यायणो वा । मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातः सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्यात्त्वा पुत्रं ददृशिवान्दृष्टवान्स मृत्युमुखान्मृत्युगोचरात् प्रमुक्तं सन्तम् ॥ ११ ॥ 【भाष्यार्थ】 तेरे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पहले तेरे प्रति स्नेहयुक्त थी उसी प्रकार वह औद्दालकि अब भी प्रीतियुक्त होकर तेरे प्रति विश्वस्त हो जायगा। यहाँ उद्दालकको ही 'औद्दालकि' कहा है तथा अरुणका पुत्र होनेसे वह आरुणि है। अथवा यह भी हो सकता है कि वह द्व्यामुष्यायण* हो। मत्प्रसृष्टः अर्थात् मुझसे आज्ञप्त होकर वह शेष रात्रियोंमें भी सुखपूर्वक यानी प्रसन्न चित्तसे शयन करेगा तथा [यह सोचकर] वीतमन्यु—क्रोधहीन हो जायगा कि तुझ पुत्रको मृत्युके मुखसे अर्थात् मृत्युके अधिकारसे मुक्त हुआ देखा है ॥ ११ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेता उवाच— 【भाष्यार्थ】 नचिकेता बोला— 【भाष्यार्थ】 * जो एक ही पुत्र दो पिताओंद्वारा संकेत करके अपना उत्तराधिकारी निश्चित किया जाता है वह 'द्व्यामुष्यायण' कहलाता है। वह अकेला ही दोनों पिताओंकी सम्पत्तिका स्वामी और उन्हें पिण्डदान करनेका अधिकारी होता है। जैसे पुत्ररूपसे स्वीकार किया हुआ पुत्रीका पुत्र अथवा अन्य दत्तक पुत्र आदि। अतः अकेले वाजश्रवसको ही औद्दालकि और आरुणि कहनेसे यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओंका उत्तराधिकारी हो।
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