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Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.12
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 12 का आध्यात्मिक रहस्य