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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 13

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 13
द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.13

Mantra: 1.13 [Kathopanishad_1.13]

स त्वमग्निःस्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 13 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मृत्यो ! आप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं, सो मुझ

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【भाष्यार्थ】 श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये, [जिसके द्वारा] स्वर्गको प्राप्त हुए पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं। दूसरे वरसे मैं यही माँगता हूँ॥ १३॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवंगुणविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्निं स त्वं मृत्योत्थेषि स्मरसि जानासि इत्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्वं प्रब्रूहि कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मह्यं स्वर्गार्थिने; येनाग्निना चितेन स्वर्गलोकाः स्वर्गो लोको येषां ते स्वर्गलोका यजमाना अमृतत्वम् अमरतां देवत्वं भजन्ते प्राप्नुवन्ति तदेतमग्निविज्ञानं द्वितीयेन वरेण वृणे ॥ १३॥ 【भाष्यार्थ】 हे मृत्यो! क्योंकि आप ऐसे गुणवाले स्वर्गलोककी प्राप्तिके साधनभूत अग्निको स्मरण रखते यानी जानते हैं, अतः मुझ स्वर्गार्थी श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये; जिस अग्निका चयन करनेसे स्वर्गप्राप्त पुरुष अर्थात् स्वर्ग ही जिनका लोक है ऐसे यजमानगण अमृतत्व—अमरता अर्थात् देवभावको प्राप्त हो जाते हैं। इस अग्निविज्ञानको मैं दूसरे वरद्वारा माँगता हूँ॥ १३॥
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