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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 19

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 19

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.19

Mantra: 1.19 [Kathopanishad_1.19]

एष तेऽग्निनचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 19 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे नचिकेत् ! तूने द्वितीय वरसे जिसे वरण किया था वह यह स्वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया। लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे। हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 एष ते तुभ्यमग्निवरो हे नचिकेतः स्वर्ग्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं वरमवृणीथाः प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निवरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः। किञ्च तमग्निं तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत्। एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुष्टेन। तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व। तस्मिन्न्द्यदत्त ऋणवानहमित्यभिप्रायः॥ १९॥ 【भाष्यार्थ】 हे नचिकेतः ! अपने दूसरे वरसे तूने जिस अग्निका वरण किया था—जिसके लिये तूने प्रार्थना की थी वह स्वर्गप्राप्तिका साधनभूत यह अग्निविज्ञान-रूप वर मैंने तुझे दे दिया। इस प्रकार उपर्युक्त अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया। यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे पुकारेंगे। यह तुझसे प्रसन्न हुए मैंने तुझे चौथा वर दिया था। हे नचिकेतः ! अब तू तीसरा वर और माँग ले, क्योंकि उसे बिना दिये मैं ऋणी ही हूँ—ऐसा इसका अभिप्राय है॥ १९॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एतावद्ध्यतिक्रान्तेन विधि-प्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यद्वरद्वयसूचितं वस्तु। न आत्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम्। अतो विधिप्रतिषेधार्थविषयस्यात्मनि 【भाष्यार्थ】 विधि-प्रतिषेध ही जिसके प्रयोजन हैं ऐसे उपर्युक्त मन्त्रब्राह्मणद्वारा इन दो वरोंसे सूचित इतनी ही वस्तु ज्ञातव्य है। आत्मतत्त्वविषयक यथार्थ ज्ञान इसका विषय नहीं है। अब, जो विधि-प्रतिषेधका विषय है, आत्मामें 【शाङ्करभाष्यम्】 क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसारबीजस्य निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणशून्यम् आत्यन्तिकनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते। तमेतमर्थं द्वितीयवरप्राप्याप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति — यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य आत्मज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थं पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते। 【भाष्यार्थ】 क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप करना ही जिसका लक्षण है तथा जो संसारका बीजस्वरूप है उस स्वाभाविक अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उससे विपरीत ब्रह्मात्मैक्य विज्ञान कहना है, जो कि क्रिया, कारक और फलके अध्यारोपरूप लक्षणसे शून्य और आत्यन्तिक निःश्रेयसरूप प्रयोजनवाला है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। इसी बातको आख्यायिकाद्वारा विस्तृत करते हैं कि तीसरे वरसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके बिना द्वितीय वरकी प्राप्तिसे भी अकृतार्थता ही है। क्योंकि आत्मज्ञानमें उसी पुरुषका अधिकार है जो पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य-साधनलक्षण एवं अनित्य फलोंसे विरक्त हो गया हो। इसलिये उनकी निन्दाके लिये पुत्रादिके उपन्याससे नचिकेताको प्रलोभित किया जाता है। 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेता उवाच तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्— 【भाष्यार्थ】 'हे नचिकेतः ! तुम तीसरा वर माँग लो' इस प्रकार कहे जानेपर नचिकेता बोला—
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