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Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.18
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 18 का आध्यात्मिक रहस्य