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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 18

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 18

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.18

Mantra: 1.18 [Kathopanishad_1.18]

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 18 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [यानी कौन ईंटें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्ग लोकमें आनन्दित होता है॥ १८॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगत्य यश्चैवमात्मरूपेण अग्निं विद्वाँश्चिनुते निर्वर्तयति नाचिकेतमग्निं क्रतुं स मृत्युपाशान् अधर्मज्ञानरागद्वेषादिलक्षणान् पुरतः, अग्रतः पूर्वमेव शरीरपाताद् इत्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैर्दुःखैर्वर्जित इत्येतद् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विरादात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥ १८॥ 【भाष्यार्थ】 जो त्रिणाचिकेत अग्निके पूर्वोक्त त्रयको जानकर अर्थात् जो ईंटें होनी चाहिये, जितनी होनी चाहिये तथा जिस प्रकार अग्निचयन करना चाहिये— इन तीनों बातोंको समझकर उस अग्निको आत्मस्वरूपसे जाननेवाला जो विद्वान् अग्नि—क्रतुका चयन करता—साधन करता है वह अधर्म, अज्ञान और राग- द्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंको पुरतः— अग्रतः अर्थात् देहपातसे पूर्व ही अपनोदन—त्याग करके शोकसे पार हुआ अर्थात् मानसिक दुःखोँसे मुक्त हुआ स्वर्गमें यानी वैराजलोकमें विराडात्मस्वरूपकी प्राप्ति होनेसे आनन्दित होता है ॥ १८ ॥
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