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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 27

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 27

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.27

Mantra: 1.27 [Kathopanishad_1.27]

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लभ्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 27 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता। अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे। जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः। न हि लोके वित्त-लाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः, यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लभ्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम्। जीवितमपि तथैव । जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत्। वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्म-विज्ञानम् ॥ २७ ॥ 【भाष्यार्थ】 मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है। लोकमें धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त करनेवाली नहीं देखी गयी। अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। जबतक आप याम्यपदपर शासन करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सम्पर्कमें आकर अल्पायु या अल्पधन कैसे रह सकता है? किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान है वही हमारा वरणीय है ॥ २७ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यतश्च— | क्योंकि—
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