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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 28

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 28

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.28

Mantra: 1.28 [Kathopanishad_1.28]

अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 28 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथ्वीपर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [स्त्रीसम्भोग आदि] सुखोंको [अस्थिररूपमें] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन् उपलब्धमानः स्वयं तु जीर्यन्मर्त्यो जरामरणवान्क्वधःस्थः कुः पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क्वधःस्थः सन् कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते। क्व तदास्थ इति वा पाठान्तरम्। अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना। तेषु पुत्रादिष्वास्था आस्थितिस्तात्पर्येण 【भाष्यार्थ】 वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों—देवताओंकी सन्निधिमें पहुँचकर उनसे प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजनको—प्राप्तव्यको जानता—प्राप्त करता हुआ भी जो स्वयं जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है अर्थात् जरामरणशील है ऐसा क्वधःस्थः—'कु' पृथिवीको कहते हैं, वह अन्तरिक्षादि लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीची [होनेके कारण 'क्वधः' कहलाती] है, उसपर जो स्थित होता है वह क्वधःस्थ कहा जाता है; ऐसा होकर भी—इस प्रकार अविवेकियोंद्वारा प्रार्थनीय पुत्र, धन और सुवर्ण आदि अस्थिर पदार्थोंको कैसे माँगेगा ? कहीं 'क्वधःस्थः' के स्थानमें 'क्व तदास्थः' ऐसा भी पाठ है। इस पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार 【शाङ्करभाष्यम्】 वर्तनं यस्य स तदास्थः, ततोऽधिकतरं पुरुषार्थं दुष्प्रापमपि प्रापयिषुः क्व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारज्ञस्तदर्थी स्यादित्यर्थः । सर्वो ह्युपर्युपर्येव बुभूषति लोकस्तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सरः-प्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदाननवस्थित-रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावद् अतिदीर्घे जीविते को विवेकी रमेत ॥ २८ ॥ 【भाष्यार्थ】 करनी चाहिये। उन पुत्रादिमें जिसकी आस्था—आस्थिति अर्थात् तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति है वह 'तदास्थ' है। जो उनसे भी उत्कृष्टतर और दुष्प्राप्य पुरुषार्थको पानेका इच्छुक है वह पुरुष उनमें आस्था करनेवाला कैसे होगा ? अर्थात् उन्हें असार समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी (इच्छुक) नहीं हो सकता, क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत ही होना चाहते हैं; अतः मैं पुत्र-धन आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं किया जा सकता। तथा वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले अप्सरा आदि सुखोंकी अस्थिररूपमें भावना करता हुआ; उन्हें यथावत् (मिथ्यारूपसे) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति दीर्घ जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्— 【भाष्यार्थ】 अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है और—
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