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कठोपनिषद् • वल्ली 5, मन्त्र 6

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 5 • मन्त्र 6
मरणोत्तर कालमें जीवकी गति

Katha Upanishad (Kathopanishad) 5.6

Mantra: 5.6 [Kathopanishad_5.6]

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्। यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम॥ ६॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 6 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे गौतम! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा [ब्रह्मको न जाननेसे] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [वह भी बतलाऊँगा]॥ ६॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 हन्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यम् इदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात् 【भाष्यार्थ】 अहो! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य—गोपनीय सनातन—चिरन्तन ब्रह्मके विषयमें बतलाऊँगा, जिसके ज्ञानसे 【शाङ्करभाष्यम्】 सर्वसंसारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरणं प्राप्य यथात्मा भवति यथा संसरति तथा शृणु हे गौतम ॥ ६ ॥ 【भाष्यार्थ】 सम्पूर्ण संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसका ज्ञान न होनेपर मरणको प्राप्त होनेके अनन्तर आत्मा जैसा हो जाता है, अर्थात् वह जिस प्रकार [जन्म-मरणरूप] संसारको प्राप्त होता है, हे गौतम ! वह सुन ॥ ६ ॥
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