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कठोपनिषद् • वल्ली 5, मन्त्र 7

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 5 • मन्त्र 7

Katha Upanishad (Kathopanishad) 5.7

Mantra: 5.7 [Kathopanishad_5.7]

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 7 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 योनिं योनिद्वारं शुक्रबीज-समन्विताः सन्तोऽन्ये केचिद् अविद्यावन्तो मूढाः प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो देहवन्तः; योनिं प्रविशन्तीत्यर्थः । स्थाणुं वृक्षादिस्थावरभावम् अन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानुसंयन्त्यनुगच्छन्ति । यथाकर्म यदस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्यादृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वसेनेत्येतत् । तथा च यथाश्रुतं यादृशं च 【भाष्यार्थ】 अन्य—कुछ अविद्यावान् मूढ देहधारी शरीर धारण करनेके लिये वीर्यरूप बीजसे संयुक्त होकर योनि—योनिद्वारको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते हैं । दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मरणको प्राप्त होकर [यथाकर्म और यथाश्रुत] स्थाणु यानी वृक्षादि स्थावर-भावका अनुवर्तन—अनुगमन करते हैं । तात्पर्य यह कि यथाकर्म यानी जिसका जो कर्म है अथवा इस जन्ममें जिसने जैसा कर्म किया है उसके अधीन होकर तथा यथाश्रुत यानी जिसने जैसा 【शाङ्करभाष्यम्】 विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । “यथाप्रज्ञं हि संभवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७ ॥ 【भाष्यार्थ】 विज्ञान उपार्जित किया है उसके अनुरूप शरीरको ही प्राप्त होते हैं। “जन्म अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हुआ करते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ७ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यत्प्रतिज्ञातं गुह्यं ब्रह्म वक्ष्यामीति तदाह — 【भाष्यार्थ】 पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा’ उसे ही बतलाते हैं—
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