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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 7 • Mantra 26

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 7 • मन्त्र 26

10.7.26

Mantra ID: 10.7.26

यत्र॑ स्क॒म्भः प्र॑ज॒नय॑न्पुरा॒णं व्यव॑र्तयत् । एकं॒ तदङ्गं॑ स्क॒म्भस्य॑ पुरा॒णम॑नु॒संवि॑दुः ॥ (२६)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.7.26 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जहां परमात्मा पुराण पुरुष को उत्पन्न करता हुआ विस्तृत करता है, उस परमात्मा के एक अंग को ज्ञानी जन पुराण के नाम से ही जानते हैं. (२६)

EN English Translation

Where The Buddha expands the creation of a man, one part of that God is known only by the name of the Knowledgeable Jan Purana. (26)

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