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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 57 • Mantra 12

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 57 • मन्त्र 12

20.57.12

Mantra ID: 20.57.12

दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे । नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हांश्च॑र॒स्योज॑सा ॥ (१२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.57.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम अपने रथ पर सवार हो कर हर्षित बने हुए हिरन के समान अनेक स्थानों पर जाते हो. जब सोमरस निचोड़ा जाता है, उस समय यज्ञ में आने से तुम्हें कोई रोक नहीं सकता. तुम अपने ही बल से महान बन कर घूमते हो. हमारा सोमरस तैयार हो जाने पर तुम हमारे यज्ञ में पधारो. (१२)

EN English Translation

O Indra! You ride on your chariot and go to many places like a happy deer. When someras is squeezed, no one can stop you from coming to the yagna at that time. You move around as great with your own strength. When our Someras is ready, you come to our yajna. (12)

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