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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 57 • Mantra 14

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 57 • मन्त्र 14

20.57.14

Mantra ID: 20.57.14

व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः । प॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न्परि॑ स्तो॒तार॑ आसते ॥ (१४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.57.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तैयार हो जाने पर सोमरस जल के समान तरल हो गया है. इस अवसर पर हम ऋत्विज्‌ तुम्हारे स्तोत्र का गान करते हुए बैठे हैं. (१४)

EN English Translation

O Indra! When ready, somerus has become liquid like water. On this occasion, we are sitting with Ritvij singing your stotra. (14)

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