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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 57 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 57 • मन्त्र 5

20.57.5

Mantra ID: 20.57.5

इ॑न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑ । इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.57.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे बहुत से कमों वाले इंद्र! मैं उन शक्तियों का वरण करता हूं जो देवता, पितर आदि में हैं. (५)

EN English Translation

O Indra of many shortcomings! I choose the powers that are in the deity, pitar etc. (5)

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