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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 31 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 31 • मन्त्र 1

6.31.1

Mantra ID: 6.31.1

आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः । पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः॑ ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.31.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ये अगमनशील और तेजस्वी सूर्य उदयाचल पर पहुंच कर पूर्व दिशा में दिखाई दे रहे हैं और अपनी किरणों से सभी प्राणियों की माता भूमि को व्याप्त कर रहे हैं. इन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को ढक लिया है. ये सूर्य वर्षा का जल देने के कारण गौ कहे जाते हैं. (१)

EN English Translation

These agni-catching and bright suns are visible in the east direction after reaching Udayachal and are pervading the mother land of all beings with their rays. They have covered heaven and space. These suns are called cows due to giving rainwater. (1)

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