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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 52 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 52 • मन्त्र 3

7.52.3

Mantra ID: 7.52.3

ईडे॑ अ॒ग्निं स्वाव॑सुं॒ नमो॑भिरि॒ह प्र॑स॒क्तो वि च॑यत्कृ॒तं नः॑ । रथै॑रिव॒ प्र भ॑रे वा॒जय॑द्भिः प्रदक्षि॒णं म॒रुतां॒ स्तोम॑मृध्याम् ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.52.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो अग्नि देव अपना धन अपने स्तुतिकर्ताओं को देते हैं, मैं उन की स्तुति करता हूं. इस द्यूत कर्म के अधिपति अग्नि देव हम जुआरियों के लाभ के लिए कृपा करें. अग्नि देव रथों के समान स्थित पासों से प्रहार करें. इस के पश्चात मैं सभी देवों की क्रम से स्तुति प्रारंभ करूं. (३)

EN English Translation

I praise the agni god who gives his wealth to his praisers. May Agni Dev, the overswami of this gaming deed, be kind for the benefit of us jurors. Strike with dice located like agni god chariots. After this, I should start praising all the gods in order. (3)

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