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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 55 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 55 • मन्त्र 2

7.55.2

Mantra ID: 7.55.2

सं क्रा॑मतं॒ मा ज॑हीतं॒ शरी॑रं प्राणापा॒नौ ते॑ स॒युजा॑वि॒ह स्ता॑म् । श॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानो॒ऽग्निष्टे॑ गो॒पा अ॑धि॒पा वसि॑ष्ठः ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.55.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे प्राण और अपान वायु! तुम दोनों आयु की कामना करने वाले मनुष्य के शरीर में संक्रमण करो तथा उस के शरीर का त्याग मत करो. हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरे इस शरीर में प्राण और अपान वायु संयुक्त रहें. इस के पश्चात तू सौ वर्ष तक जीवित रहे. जीवित रहते हुए तेरे हवि आदि से समृद्ध होते हुए अग्ने देव तेरी रक्षा करने वाले, तुझे अपना समझने वाले तथा निवास स्थान देने वाले हों. (२)

EN English Translation

O life and your air! Both of you transition into the body of a man who wishes for life and do not give up his body. O men wishing for age! May life and your air be combined in this body of yours. After this you lived for a hundred years. While living, enriched by your havi etc., let the agni god protect you, consider you as his own and give you a place of residence. (2)

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