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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 55 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 55 • मन्त्र 3

7.55.3

Mantra ID: 7.55.3

आयु॒र्यत्ते॒ अति॑हितं परा॒चैर॑पा॒नः प्रा॒णः पुन॒रा तावि॑ताम् । अ॒ग्निष्टदाहा॒र्निरृ॑तेरु॒पस्था॒त्तदा॒त्मनि॒ पुन॒रा वे॑शयामि ते ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.55.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम्हारा जो जीवन तुम्हें छोड़ कर और तुम्हारा अतिक्रमण कर के गया है, वह प्राण और अपान वायु की कृपा से पुनः वापस आ जाए. उस आयु का अनिने ने निकृष्ट गति वाली मृत्यु के पास से हरण कर लिया है. अग्नि के द्वारा हरण कर के लाई गई उस आयु को मैं तेरे शरीर में पुनः स्थापित करता हूं. (३)

EN English Translation

O men wishing for age! May your life, which has left you and been encroached upon by you, come back again by the grace of life and your air. Anine has taken that age from near death with poor speed. I restore that age brought by agni in your body. (3)

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