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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 11

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 11

17.1.11

Mantra ID: 17.1.11

त्वमि॑न्द्रासिविश्व॒जित्स॑र्व॒वित्पु॑रुहू॒तस्त्वमि॑न्द्र । त्वमि॑न्द्रे॒मं सु॒हवं॒स्तोम॒मेर॑यस्व॒ स नो॑ मृड सुम॒तौ ते॑ स्याम॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (११)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम विश्वविजयी एवं सभी को जीतने वाले हो. हे इंद्र! तुम बहुतों के द्वारा यज्ञो में बुलाए जाने वाले हो. हे इंद्र! तुम इस समय की जाती हुई शोभन ज्ञान की साधन स्तुतियों के लिए हमें प्रेरित करो. तुम हमारी रक्षा करो. हम तुम्हारी उत्तम बुद्ध में रहें अर्थात्‌ हमारे प्रति तुम्हारी श्रेष्ठ भावना हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात्‌ शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (११)

EN English Translation

O Indra! You are a world champion and a conqueror of all. O Indra! You are going to be called to the yagyas by many. O Indra! Inspire us to praise the means of knowledge that you do at this time. You protect us. May we be in your best Buddha, that is, your superior feeling towards us. O broad Indra! Your semen i.e. powers are of many types. May you complete us with animals of many forms like cows, horses, etc. and establish us in sudha located in the supreme vyom. (11)

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