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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 13

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 13

17.1.13

Mantra ID: 17.1.13

या त॑ इन्द्रत॒नूर॒प्सु या पृ॑थि॒व्यां यान्तर॒ग्नौ या त॑ इन्द्र॒ पव॑माने स्व॒र्विदि॑ । यये॑न्द्र त॒न्वा॒न्तरि॑क्षं व्यापि॒थ तया॑ न इन्द्र त॒न्वा॒ शर्म॒ यच्छ॒तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैःसु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (१३)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.13 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे परम ऐश्वर्य वाले सूर्य! तुम्हारी जो विभूतियां जलों में, पृथ्वी पर, आकाश में हैं तथा तुम्हारी जो विभूति अंतरिक्ष में गतिशील वायु में है, हे इंद्र उन विभूतियों अथवा मूर्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, भैंस आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में स्थित जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१३)

EN English Translation

O sun of supreme opulence! May your personalities, which are in the waters, on earth, in the sky and yours in the moving air in space, O Indra, give us happiness through those personalities or idols. O broad sun! Your powers are infinite. You complete us with animals of many forms like cows, buffaloes, etc. and establish us in the sudha that is located in the supreme vyom. (13)

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