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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 16

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 16

17.1.16

Mantra ID: 17.1.16

त्वं र॑क्षसेप्र॒दिश॒श्चत॑स्र॒स्त्वं शो॒चिषा॒ नभ॑सी॒ वि भा॑सि । त्वमि॒मा विश्वा॒ भुव॒नानु॑तिष्ठस ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑षि वि॒द्वांस्तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वंनः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (१६)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.16 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सूर्य! तुम चारों दिशाओं की रक्षा करते हो और अपनी किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हो. तुम इन सभी भुवनों को प्रकाशित करते हो. तुम सत्य अथवा यज्ञ की स्थिति जानते हुए उन के मार्गो को क्रम से व्याप्त करते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें धेनु, अश्व॒ आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१६)

EN English Translation

O sun! You protect the four directions and illuminate the sky with your rays. You illuminate all these bhuvanas. Knowing the status of truth or sacrifice, you spread their paths in order. O broad sun! Your powers are infinite. May you complete us with animals of many forms such as dhenu, horse, etc. and establish us in the sudha that is in the supreme vyom. (16)

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