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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 18

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 18

17.1.18

Mantra ID: 17.1.18

त्वमिन्द्र॒स्त्वं म॑हे॒न्द्रस्त्वं लो॒कस्त्वं प्र॒जाप॑तिः । तुभ्यं॑ य॒ज्ञो विता॑यते॒ तुभ्यं॑ जुह्वति॒ जुह्व॑त॒स्तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (१८)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.18 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे ऐश्वर्य शाली सूर्य! तुम स्वर्ग के स्वामी एवं महत्त्वपूर्ण गुण से युक्त हो. स्वर्ग आदि लोक तुम ही हो तथा तुम ही प्रजाओं के स्वामी हो. तुम्हारे लिए यज्ञ विस्तृत किए गए. (१८)

EN English Translation

O glorious sun! You are the swami of heaven and possess important qualities. You are the people of heaven and you are the master of the people. Sacrifices were extended for you. (18)

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