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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 21

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 21

17.1.21

Mantra ID: 17.1.21

रुचि॑रसि रो॒चोऽसि॑ । स यथा॒ त्वं रुच्या॑ रो॒चोऽस्ये॒वाहं प॒शुभि॑श्च ब्राह्मणवर्च॒सेन॑ चरुचिषीय ॥ (२१)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.21 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सूर्य! तुम दीप्ति रूप हो तथा दूसरों को दीप्ति वाला बनाते हो. तुम जिस प्रकार दीप्ति से दीप्ति मग्न हो, उसी प्रकार मैं पशुओं तथा ब्राह्मणोचित तेज से संपन्न बनूं. (२१)

EN English Translation

O sun! You are a bright form and make others radiant. Just as you are filled with radiance, so should I be endowed with animals and Brahmanical glory. (21)

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