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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 13 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 13 • मन्त्र 3

5.13.3

Mantra ID: 5.13.3

वृषा॑ मे॒ रवो॒ नभ॑सा॒ न त॑न्य॒तुरु॒ग्रेण॑ ते॒ वच॑सा बाध॒ आदु॑ ते । अ॒हं तम॑स्य॒ नृभि॑रग्रभं॒ रसं॒ तम॑स इव॒ ज्योति॒रुदे॑तु॒ सूर्यः॑ ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.13.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३)

EN English Translation

My word roars like rain and thunders like a cloud. I bind your serpent with my fierce word. Just as darkness is destroyed at sunrise, so this man becomes free from poison and becomes alive. (3)

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