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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 5 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 5 • मन्त्र 2

5.5.2

Mantra ID: 5.5.2

यस्त्वा॒ पिब॑ति॒ जीव॑ति॒ त्राय॑से॒ पुरु॑षं॒ त्वम् । भ॒र्त्री हि शश्व॑ता॒मसि॒ जना॑नां च॒ न्यञ्च॑नी ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.5.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो तुझे पीता है, वह जीवित रहता है. तू पुरुष की रक्षा करती है, तू मनुष्यों का भरणपोषण करने वाली एवं उन्नत बनाने वाली है. (२)

EN English Translation

He who drinks you lives. You protect men, you are the sustainer and uplifter of human beings. (2)

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