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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 6 • Mantra 11

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 6 • मन्त्र 11

5.6.11

Mantra ID: 5.6.11

इन्द्र॑स्य गृ॒होऽसि॑ । तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्र वि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरुषः॒ सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑ ॥ (११)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.6.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम इंद्र के गृह हो. तुम सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा एवं सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित आप की शरण में आया हूं. (११)

EN English Translation

O agni! You are Indra's home. You are the one who travels everywhere, the man of all, the soul of all and the body of all. I have come to aap's shelter along with all my colleagues. (11)

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