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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 11 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 11 • ऋचा / मन्त्र 2

10.11.2

Mantra ID: 10.11.2

रप॑द्गन्ध॒र्वीरप्या॑ च॒ योष॑णा न॒दस्य॑ ना॒दे परि॑ पातु मे॒ मनः॑ । इ॒ष्टस्य॒ मध्ये॒ अदि॑ति॒र्नि धा॑तु नो॒ भ्राता॑ नो ज्ये॒ष्ठः प्र॑थ॒मो वि वो॑चति ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.11.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अन्ने के गुणों का वर्णन करने वाली गंधर्वपत्नी एवं जलों से संस्कृत आहुति ने अग्नि को विशेष तृप्त किया है. मेरा मन स्तुतियों के उच्चारण में भली-भांति लगा रहे. खंडनरहित अग्नि हमें यज्ञ के बीच में स्थित करें. यजमानों में मुख्य अर्थात्‌ मेरे बड़े भाई अग्नि की विशेषरूप से स्तुति करें. (२)

EN English Translation

The Sanskrit ahuti of gandharva wife and water describing the qualities of the ane has made the agni specially satiated. My mind was well engaged in the chanting of praises. Let the unbroken agni place us in the middle of the yagna. Especially praise the chief of hosts, that is, my elder brother Agni. (2)

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