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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 11 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 11 • ऋचा / मन्त्र 5

10.11.5

Mantra ID: 10.11.5

सदा॑सि र॒ण्वो यव॑सेव॒ पुष्य॑ते॒ होत्रा॑भिरग्ने॒ मनु॑षः स्वध्व॒रः । विप्र॑स्य वा॒ यच्छ॑शमा॒न उ॒क्थ्यं१॒॑ वाजं॑ सस॒वाँ उ॑प॒यासि॒ भूरि॑भिः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.11.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम पशुओं को पुष्ट करने वाली घास के समान सदा रमणीय हो. तुम मनुष्यों के हव्य से शोभन यज्ञ वाले बनो. तुम स्तोता की स्तुतियों की प्रशंसा करते हुए एवं हव्य का उपभोग करते हुए बहुत से देवों के साथ जाते हो. (५)

EN English Translation

O agni! You are always delightful like the grass that reinforces the animals. You become the ones with the adornment of the human beings. You go with many gods praising the hymns of the Stota and consuming the havya. (5)

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