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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 115 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 115 • ऋचा / मन्त्र 2

10.115.2

Mantra ID: 10.115.2

अ॒ग्निर्ह॒ नाम॑ धायि॒ दन्न॒पस्त॑मः॒ सं यो वना॑ यु॒वते॒ भस्म॑ना द॒ता । अ॒भि॒प्र॒मुरा॑ जु॒ह्वा॑ स्वध्व॒र इ॒नो न प्रोथ॑मानो॒ यव॑से॒ वृषा॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.115.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अनेक यज्ञकार्यं करने वाले एवं दाता अग्नि को धारण किया गया है. यह प्रकाशरूपी दांतों से वनों का भक्षण करते हैं. जुहू नामक ऊंचे पात्र में यज्ञ का भाग प्राप्त करने वाले इंद्र इस प्रकार हव्यभक्षण करते हैं, जिस प्रकार शक्तिशाली बैल घास खाता है. (२)

EN English Translation

Many yajna works and donor agni has been worn. They feed forests with light-like teeth. Indra, who receives the part of the yajna in a high vessel called Juhu, meditates in such a way that the powerful bull eats grass. (2)

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