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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 123 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 123 • ऋचा / मन्त्र 4

10.123.4

Mantra ID: 10.123.4

जा॒नन्तो॑ रू॒पम॑कृपन्त॒ विप्रा॑ मृ॒गस्य॒ घोषं॑ महि॒षस्य॒ हि ग्मन् । ऋ॒तेन॒ यन्तो॒ अधि॒ सिन्धु॑मस्थुर्वि॒दद्ग॑न्ध॒र्वो अ॒मृता॑नि॒ नाम॑ ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.123.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मेधावियों ने महान्‌ पशु के समान शब्द सुनकर वेन के रूप की कल्पना की. उन्होंने यज्ञ से वेन को तृप्त करके जलसमूह को प्राप्त किया. जल के स्वामी वेन मरणरहित हैं. (४)

EN English Translation

The meritorious people imagined the form of Ven by hearing the words of the great animal. They received the water group by satiating Ven with the yajna. Wen, the lord of water, is moribund. (4)

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