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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 124 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 124 • ऋचा / मन्त्र 3

10.124.3

Mantra ID: 10.124.3

पश्य॑न्न॒न्यस्या॒ अति॑थिं व॒याया॑ ऋ॒तस्य॒ धाम॒ वि मि॑मे पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि पि॒त्रे असु॑राय॒ शेव॑मयज्ञि॒याद्य॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑मि ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.124.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं आकाश में गमन वाले सूर्य को देखता हुआ ऋतुओं के अनुरूप अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करता हूं. मैं शक्तिशाली पितरों के सुख के लिए होता बनकर मंत्र बोलता हूं तथा यज्ञ के अनुपयुक्त स्थान से उपयुक्त स्थान में जाता हूं. (३)

EN English Translation

I observe the sun moving in the sky and perform a variety of yagnas to suit the seasons. I speak mantras as i happen for the happiness of the mighty fathers and go from the inappropriate place of the yagna to the appropriate place. (3)

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