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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 125 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 125 • ऋचा / मन्त्र 2

10.125.2

Mantra ID: 10.125.2

अ॒हं सोम॑माह॒नसं॑ बिभर्म्य॒हं त्वष्टा॑रमु॒त पू॒षणं॒ भग॑म् । अ॒हं द॑धामि॒ द्रवि॑णं ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्ये॒३॒॑ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.125.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं पत्थर से पीसे जाने वाले सोम, त्वष्टा, पूषा एवं भग को धारण करती हूं. मैं हव्य धारण करने वाले, देवों को शोभन हवि देने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन देती हूं. (२)

EN English Translation

I wear the stone-grinding som, tattva, pusha and bhaga. I give money to the host who wears the haavya, who gives the gods a warm offering and who squeezes the somras. (2)

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