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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 178 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 178 • ऋचा / मन्त्र 2

10.178.2

Mantra ID: 10.178.2

इन्द्र॑स्येव रा॒तिमा॒जोहु॑वानाः स्व॒स्तये॒ नाव॑मि॒वा रु॑हेम । उर्वी॒ न पृथ्वी॒ बहु॑ले॒ गभी॑रे॒ मा वा॒मेतौ॒ मा परे॑तौ रिषाम ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.178.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र की दानशक्ति के समान गरुड़ की दानशक्ति को आह्वान करने वाले हम इस पर कल्याण के लिए नाव के समान चढ़ते हैं. हे विस्तृत, विशाल, व्यापक एवं गंभीर द्यावा-पृथिवी! हम आतेजाते समय में नष्ट न हों. (२)

EN English Translation

Like Indra's charity, we, who invoke the charity power of Garuda, climb on it like a boat for welfare. O vast, vast, wide and solemn Diya-Earth! Let us not perish in the coming and going. (2)

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