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10.4.1
प्र ते॑ यक्षि॒ प्र त॑ इयर्मि॒ मन्म॒ भुवो॒ यथा॒ वन्द्यो॑ नो॒ हवे॑षु । धन्व॑न्निव प्र॒पा अ॑सि॒ त्वम॑ग्न इय॒क्षवे॑ पू॒रवे॑ प्रत्न राजन् ॥ (१)
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ऋग्वेद मन्त्र 10.4.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हवि देता हूं एवं सुंदर स्तुतियां बोलता हूं. हे सबके वंदनीय अग्नि! तुम हमारे आह्वानों में आते हो. हे प्राचीन एवं सबके स्वामी अग्नि! जिस प्रकार मरुस्थल में छोटा जलाशय भी सुखद होता है, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्ता मनुष्य को धन देकर सुखदाता बनते हो. (१)
EN English Translation
O agni! I give you a greeting and speak beautiful praises. O agni for all! You come to our calls. O ancient and lord of all, agni! Just as a small reservoir in the desert is also pleasant, so you become a giver of happiness by giving money to the sacrificial man. (1)